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सुरेखा सीकरी: सिर्फ एक लाइन बोल कर यादों में दर्ज रह जाने वाला किरदार

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फिल्‍म ‘सरफरोश’ के कुछ सीन की बात हों जो देर तक आपके जेहन में बसे रहते हैं तो उनमें से एक सीन सुरेखा सीकरी वाला होगा. पूरी फिल्‍म में सुरेखा सीकरी का केवल एक सीन था. एक सीन और एक पंक्ति और वे हमेशा के लिए याद बन जाती हैं. ऐसे ही उनके हिस्‍से में कम काम आया मगर जितना आया उसमें उनकी अलग छाप दिखाई देती हैं. इसी वजह से उन्‍हें तीन बार राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार भी मिला और अभिनय के लिए सम्‍मान व प्‍यार भी.

19 अप्रैल 1945 को जन्‍मी सुरेखा सीकरी का निधन 16 जुलाई 2021 को हुआ था. उम्र के अंतिम पड़ाव पर ‘दादी’ की भूमिकाओं में चर्चित हुई सुरेखा सीकरी के जीवन में अभिनय की शुरुआत भी नाटकीयता के साथ हुई. वे अभिनय तो करना ही नहीं चाहती थीं. अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में पढ़ाई का दौर था जब प्रख्‍यात नाट्य निर्देश इब्राहिम अलकाजी का नाटक हुआ. सरेखा की बहन को नाटक पसंद आया और वह राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय में प्रवेश का फार्म ले आई. बहन ने तो फार्म भरा नहीं लेकिन बात सुरेखा तब आ गई और ना-नुकुर करते हुए उन्‍होंने फार्म भर ही दिया. इस तरह एनएसडी की राह खुली.

अभिनय की बारहखड़ी सीख कर जब वे दक्ष हो मैदान में आईं तो उन्‍हें पहली‍ फिल्‍म इमरजेंसी पर बनी फिल्म ‘किस्सा कुर्सी का’ मिली. इस फिल्‍म में सुरेखा सीकरी ने शबाना आजमी के सामने अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करवाई थी. वैसे ही श्‍याम बेनेगल की फिल्‍म ‘मम्मो’ में मुख्‍य किरदार फरीदा जलाल था लेकन फय्याजी के रूप में सुरेखा सिकरी देर तक याद रहती हैं. ये वे किरदार हैं जिन्‍हें गुजरे जमाने ने खुद याद किया लेकिन आज उन्‍हें घर-घर तक पहचाना जाता है तो ‘बालिका वधू’ धारावाहिक की दादी सा यानी कल्याणी देवी के रूप में. 1986 में आई फिल्म ‘तमस’ में उनकी अदाकारी के लिए उन्हें पहला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला. 1989 में उन्हें ‘संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया. इसके बाद 1994 में आई फिल्म ‘मम्मो’ के लिए भी उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला. 2018 में आई फिल्म ‘बधाई हो’ के लिए उन्हें तीसरी बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

‘बधाई हो’ फिल्‍म के केंद्र बिंदु में नीना गुप्‍ता की कहानी है मगर सुरेखा सीकरी के बिना फिल्‍म बेजान ही होती. खासकर, फिल्‍म का टर्निंग पाइंट कहा जाने वाला वह सीन जब सास यानी सुरेखा सीकरी अपनी दूसरी बहू और बेटी के सामने बड़ी बहू नीना गुप्‍ता का पक्ष लेती हैं. हमेशा डांट लगाने वाली सास का यह रूप बहू के लिए ही नहीं दर्शकों के लिए भी सुखद अचरज वाला होता है. लगता है, ऐसा ही होता है जीवन.

यही वह दृश्‍य था जिसके कारण सुरेखा सीकरी को ‘बधाई हो’ फिल्‍म मिली थी. फिल्‍म के निर्देशक अमित शर्मा ने एक इंटरव्‍यू में बताया था कि ‘बधाई हो’ के आखिरी चरण में एक बहुत ही महत्वपूर्ण दृश्य था जिसमें ‘दादी’ अपनी बहू का बचाव करती है. मेरे दिमाग में शुरू से ही यह बात पक्की थी कि जो भी दादी का किरदार निभाएगा, उसे उस सीन को सही ढंग से करना होगा. इसलिए, मैंने सुरेखा जी से बात की और उन्हें उस दृश्य को पढ़ने के बारे में बताया. हम दो बार पढ़ने गए लेकिन उसने कहा कि उसे थोड़ा और समय लगेगा क्योंकि वह ‘तैयारी’ करना चाहती थी. अंतत: सुरेखा सीकरी उस दृश्य की तैयारी कर कार्यालय में आती हैं. जैसे ही उन्‍होंने संवाद पढ़े श्रोताओं के रोंगटे खड़े हो गए. निर्देशक अमित शर्मा बताते हैं कि मेरे कार्यालय में हर कोई वहां पहुंच गया था. जब उन्‍होंने पढ़ना बंद किया तो सब निशब्‍द थे.

सुरेखा सीकरी क्‍यों सुरेखा सीकरी हैं, यह जानने के लिए उनकी रचना विवेक समझना होगा. ‘बधाई हो’ के युवा निर्देशक अमित शर्मा बताते हैं कि उनमें सबसे आकर्षक बात उनका समर्पण था. यह स्वाभाविक है कि जब आप किसी चीज पर वर्षों से काम कर रहे होते हैं तो आप आराम से काम करते हैं या आराम महसूस करते हैं. हम सभी का रवैया यह है कि ‘हां ये तो रोज का काम है, कर लेंगे.’ सुरेखा जी में मैंने वह भाव कभी नहीं देखा. वह प्रत्येक दृश्य की पंक्तियां, एक्शन और हर चीज के साथ तैयार होकर आती थी. मैंने कभी उन्‍हें मुझसे ब्रेक मांगते या कई टेक देने से इनकार करते नहीं देखा. वह हमेशा और अधिक करने के लिए उत्साहित रहती थीं. शॉट के बाद, वह कहती, ‘यार, क्या तुम्हें अपना शॉट मिल गया!’

यहां यह याद रखना जरूरी है कि जब वे इस समर्पण के साथ काम कर रही थीं तब उनकी उम्र 70 वर्ष से अधिक थी. ऐसा समर्पण उनकी विशेषता थी, जो हमें प्रेरित करता है. हालांकि, तथ्‍य यह भी है कि उनके अभिनय को ‘तमस’, ‘मम्मो’, ‘सलीम लंगड़े पे मत रो’, ‘जुबैदा’ जैसी फिल्मों में सराहा गया, खूब तारीफें की गई लेकिन लोकप्रियता का चरम धारावाहिक ‘बालिका वधू’ की दादीसा से मिला. ‘बधाई हो’ फिल्‍म ने इसे विस्‍तार दिया. यानी चालीस सालों की अभिनय यात्रा में उन्‍हें उम्र के आखिरी चरण में पहचाना गया. वे इस पर कई बार ठहाका मार हंस दिया करती थीं. इस ठहाके में पीछे छिपी पीड़ा को समझा जा सकता है.

एक तथ्‍य यह भी है कि अंतिम समय में वे काम का इंतजार कर रही थीं. असल में कोरोना लॉकडाउन के कारण बच्‍चों तथा 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के काम पर पाबंदी थी. उसी समय में यह खबर भी फैली कि सुरेखा सिकरी जैसी दिग्‍गज अभिनेत्री बीमारी के क्षणों में आर्थिक संकट झेल रही हैं. इसका खंडन भी हुआ और बाद में सुरेखा सीकरी ने मीडिया से संवाद में कहा था कि मैं काम करना चाहती हूं. कार्य के प्रति यही ललक और समर्पण उनकी पहचान थी. ऐसा समर्पण कि उनका ख्‍याल आते ही उनकी दमदार आवाज और मुखमुद्रा जेहन में तैर जाती है. उनका यही प्रभाव है जो उन्‍हें सुरेखा सीकरी बनाता है.

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