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क्या होता है रेडियो कॉलर जो कूनो में टाइगर्स को लगेगा, ये कैसे लगता है और क्या काम करता

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रेडियो कॉलर और टाइगर्स: मध्‍य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में टाइगर्स को रेडियो कॉलर्स लगाए जाएंगे. इससे उनकी चहलकदमी पर आसानी से नजर रखी जा सकेगी. रेडियो कॉलर ऐसा छोटा उपकरण है, जो जानवरों की गर्दन पर बांधा जाता है. रेडियो कॉलर की मदद से की जाने वाली निगरानी कई शोध क्षेत्रों में इस्‍तेमाल की जा सकती है. इसका इस्‍तेमाल प्राणी विज्ञान के शोध कार्यों के साथ ही पशु पालन और वातावरण सुरक्षा के लिए भी किया जा सकता है.

रेडियो कॉलर एक इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस है, जिसमें एक छोटा ट्रांसमीटर होता है. ये ट्रांसमीटर रेडियो तरंगों के जरिये सिग्‍नल भेजता है. ये सिग्‍नल दूसरे डिवाइस तक पहुंचते हैं, जहां उन्हें रिसीव किया जा सकता है. रेडियो कॉलर के अंदर मौजूद बैटरी ट्रांसमीटर को चलाती है. रेडियो कॉलर आमतौर पर नायलॉन या चमड़े से बनाया जाता है. इससे प्राणी की गर्दन को ज्‍यादा नुकसान नहीं पहुंचाता है. इसमें लगा ट्रांसमीटर एक खास फ्रीक्‍वेंसी पर संकेत पैदा करता है, जिसे 5 किमी दूर से ट्रैक किया जा सकता है.

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कैसे पहनाया जाता है रेडियो कॉलर
ज्‍यादातर बार किसी जानवर को इलाज के बाद जंगल में छोड़ने पर रेडियो कॉलर का इस्‍तेमाल किया जाता है. रेडियो कॉलर जीपीएस प्रणाली से लैस उपकरण है, जो जानवर के ठिकाने के बारे में जानकारी देता है. इनका वजन 8 किग्रा तक होता है. किसी भी वन्‍यप्राणी की दौड़ने, चलने, खाने, पीने जैसी गतिविधियों को समझने के लिए कॉलर में एक्सेलेरोमीटर भी जोड़ा जा सकता है. वर्ल्‍ड वाइल्‍ड लाइफ फंड के मुताबिक, कॉलर लगाने की प्रक्रिया में जानवर की पहचान करना, उसे सेडेटिव देकर शांत करना और होश में आने से पहले गले में एक कॉलर फिट करना शामिल है.

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ज्‍यादातर बार किसी जानवर को इलाज के बाद जंगल में छोड़ने पर रेडियो कॉलर का इस्‍तेमाल किया जाता है.

रेडियो कॉलर कैसे करता है काम
रेडियो कॉलर प्राणी की गर्दन पर पट्टे के तौर पर बांधा जाता है. इसमें एक ट्रांसमीटर डिवाइस नियमित अवधि के अंतराल पर रेडियो सिग्‍नल भेजता है. फिर ट्रैकिंग उपकरण या रेडियो रिसीवर इन सिग्‍नल्‍स को रिसीव करते हैं और वन्‍यजीव की स्थिति का पता लगाते हैं. कुछ रेडियो कॉलर में ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम का भी इस्तेमाल होता है. इससे प्राणी की सक्रियता को समझने में मदद मिलती है. रेडियो कॉलर्स कई तरह के होते हैं. इनमें वीएचएफ, जीपीएस, सैटेलाइट कॉलर्स शामिल हैं.

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कौन सा कॉलर कैसे करता है काम
अति-उच्‍च आवृत्ति (VHF) वाले कॉलर्स वन्‍य प्राणियों के लिए ही बनाए जाते हैं. ये कॉलर्स सिग्‍नल को वीएचएफ रेडियो तरंगों के जरिये ट्रांसमीट करते हैं. इन कॉलर्स की रेंज आमतौर पर कई किमी तक होती है. वहीं, जीपीएस कॉलर्स प्राणियों की सक्रियता की निगरानी में इस्तेमाल किए जाते हैं. जीपीएस कॉलर्स सैटेलाइट के साथ जुड़ते हैं. इससे वन्‍यजीव की सटीक स्थिति का पता लग जाता है. जीपीएस कॉलर्स से प्राणी की रफ्तार, जगह और गतिविधियों का अनुमान लगाने में मदद मिलती है. सैटेलाइट कॉलर्स सबसे आधुनिक कॉलर्स हैं. ये कॉलर्स सैटेलाइट से जुड़कर प्राणी की स्थिति के अलावा उसकी दूरी के बारे में भी बताते हैं.

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रेडियो कॉलर लगाने के क्‍या फायदे हैं
वन्‍यजीवों में रेडियो कॉलर लगाने से कई तरह के फायदे होते हैं. रेडियो कॉलर के इस्तेमाल से प्राणियों को ट्रैक करना काफी आसान हो जाता है. इससे उनकी गति, स्थान और आचरण का अध्ययन किया जा सकता है. प्राणियों की स्थिति का पता लगाकर उनकी सुरक्षा के लिए सही कार्यवाही की जा सकती है. इसके अलावा रेडियो कॉलर वैज्ञानिक अध्‍ययनों में महत्वपूर्ण भमिका निभाते हैं. इसके जरिये प्राणियों के व्यवहार, आहार विहीन क्षेत्र और जाति के आचरण को समझने में मदद मिलती है. रेडियो कॉलर के जरिये खतरे में पड़ी प्रजातियों को ट्रैक कर सुरक्षा उपलब्‍ध कराई जा सकती है.

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वन्‍यजीवों में रेडियो कॉलर लगाने के फायदों के साथ ही कुछ नुकसान भी सामने आए हैं.

क्‍या रेडियो कॉलर का कोई नुकसान भी है
रेडियो कॉलर लगाने से सिर्फ फायदा ही नहीं होता, बल्कि इसके कुछ नुकसान भी सामने आए हैं. रेडियो कॉलर बांधने से प्राणी के स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है. कई बार देखा गया है कि रेडियो कॉलर बांधने से कुछ प्रजातियों में तनाव, चोट और दूसरी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा हुई हैं. इसके अलावा रेडियो कॉलर वन्‍यजीव की गर्दन को नुकसान पहुंचा सकता है. दरअसल, इसे जानवरों की गर्दन पर मजबूती से बांधा जाता है. रेडियो कॉलर में ट्रांसमीटर को सुचारू रखने के लिए एक बैटरी लगाई जाती है. अगर बैटरी के रखरखाव का ध्यान नहीं रखा जाता तो इससे वन्‍यजीव को नुकसान पहुंच सकता है.

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