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Mission Moon: चंद्रयान-3 में क्या है फेलियर बेस्ड डिजाइन और कैसे सफल लैंडिंग में करेगा मदद? जानें 10 खास बातें

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बेंगलुरु. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) अपने तीसरे लूनर मिशन चंद्रयान-3 (Chandrayaan-3) की लॉन्चिंग के लिए पूरी तरह तैयार है. इस मिशन को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा से 14 जुलाई को प्रक्षेपण यान मार्क-3 (LVM-3) से शुक्रवार दोपहर बाद 2:35 बजे लॉन्च करने की योजना है. इसे लेकर मंगलवार को 24 घंटे का ‘लॉन्च रिहर्सल’ पूरा कर लिया है और अब बस इंतजार है उस पल का जब यह चंद्रयान चांद की तरफ कूच करेगा.

चंद्रयान-2 मिशन के दौरान लैंडर को ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ करने में सफलता नहीं मिल पाई थी और इस लिहाज से चंद्रयान-3 मिशन को भारत के लिए काफी अहम माना जा रहा है. यही वजह है कि भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी ने इस बार चंद्रयान-3 को बेहद खास तरीके से डिजाइन किया है. चंद्रयान-3 में कई सुरक्षा उपायों के साथ ज्यादा ईंधन भरा गया है. इसके साथ ही इसके लिए एक बड़ा लैंडिंग साइट रखा है. इसरो इसे फेलियर बेस्ड डिजाइन या कहें ‘विफलता-आधारित डिजाइन’ बता रहा है, जिससे कुछ चीजें गलत होने पर भी मून रोवर चांद पर सफलतापूर्वक लैंड कर सकेगा.

चंद्रयान-3 शुक्रवार दोपहर 2:35 बजे चांद के लिए उड़ान भरने को तैयार है. यह सितंबर 2019 में भेजे गए चंद्रयान-2 के बाद का मिशन है, जो एक सॉफ्टवेयर गड़बड़ी के कारण चांद की सतह पर ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ करने में असफल रहा था. इसरो ने कहा कि इस बार चंद्रयान-3 के लिए ‘विफलता-आधारित डिज़ाइन’ का विकल्प चुना गया है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कुछ चीजें गलत होने पर भी लैंडर चंद्रमा पर सफलतापूर्वक उतर सके.

इसरो अध्यक्ष एस सोमनाथ ने कहा कि ‘चंद्रयान-2’ के सफलता-आधारित डिज़ाइन के बजाय, अंतरिक्ष एजेंसी ने ‘चंद्रयान-3’ में विफलता-आधारित डिज़ाइन को चुना है और इस बात पर ध्यान दिया गया है कि कुछ चीजों के गलत होने पर भी इसे कैसे बचाया जाए तथा कैसे सफल ‘लैंडिंग’ सुनिश्चित की जाए.

इसरो प्रमुख ने कहा, ‘हमने बहुत सी विफलताओं को देखा- सेंसर की विफलता, इंजन की विफलता, एल्गोरिदम की विफलता, गणना की विफलता. इसलिए, जो भी विफलता हो, हम चाहते हैं कि यह आवश्यक वेग और निर्दिष्ट मान पर उतरे. इसलिए, अंदर अलग-अलग विफलता परिदृश्यों की गणना और योजनाबद्ध तरीके से कार्य किया गया है.’

उन्होंने चंद्रयान-2 के लैंडर ‘विक्रम’ के ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ करने में असफल रहने का ब्योरा साझा करते हुए कहा कि जब इसने चंद्रमा की सतह पर 500 मीटर x 500 मीटर के निर्दिष्ट लैंडिंग स्थल की ओर उतरना शुरू किया तो इसके वेग को धीमा करने के लिए डिजाइन किए गए इंजनों में उम्मीद से अधिक बल विकसित हो गया.

सोमनाथ ने यहां एसआईए इंडिया द्वारा आयोजित भारतीय अंतरिक्ष कांग्रेस से इतर संवाददाताओं से कहा, ‘प्राथमिक मुद्दे थे, पहला-हमारे पास पांच इंजन थे, जिनका उपयोग वेग को कम करने के लिए किया गया. इन इंजनों में अपेक्षा से अधिक बल विकसित हो गया.’

इसरो प्रमुख ने कहा कि अधिक बल उत्पन्न होने से कुछ ही अवधि में त्रुटियां पैदा हो गईं. उन्होंने कहा, ‘सभी त्रुटियां एक साथ हो गईं, जो हमारी अपेक्षा से कहीं अधिक थीं. यान को बहुत तेजी से मुड़ना पड़ा. जब यह बहुत तेजी से मुड़ने लगा, तो इसके मुड़ने की क्षमता सॉफ्टवेयर द्वारा सीमित हो गई. हमने कभी ऐसी स्थिति की उम्मीद नहीं की थी. यह दूसरा मुद्दा था.’

सोमनाथ ने कहा कि विफलता का तीसरा कारण अंतरिक्ष यान को उतारने के लिए निर्दिष्ट किया गया 500 मीटर x 500 मीटर का छोटा स्थल था. उन्होंने कहा, ‘यान अपना वेग बढ़ाकर वहां पहुंचने की कोशिश कर रहा था. यह सतह के लगभग करीब था और लगातार वेग बढ़ा रहा था.’ उन्होंने कहा, संक्षेप में कहें तो चंद्रयान-2 में समस्या यह थी कि पथ-विचलन को संभालने की इसकी क्षमता बहुत सीमित थी.

इसरो अध्यक्ष ने कहा, ‘तो, इस बार हमने जो किया वह बस इसे और विस्तारित करना था, इस बात पर ध्यान देकर कि ऐसी कौन-कौन सी चीज हैं, जो गलत हो सकती हैं. इसलिए, चंद्रयान-2 के सफलता-आधारित डिजाइन के बजाय, हमने चंद्रयान-3 में विफलता-आधारित डिजाइन को चुना है. क्या-क्या विफल हो सकता है, और इसे कैसे बचाया जाए, हमने यही दृष्टिकोण अपनाया है.’

सोमनाथ ने कहा, ‘हमने लैंडिंग के क्षेत्र को 500 मीटर x 500 मीटर से बढ़ाकर 4 किलोमीटर x 2.5 किलोमीटर कर दिया है. यह कहीं भी उतर सकता है, इसलिए यह आपको एक विशिष्ट बिंदु को लक्षित करने तक सीमित नहीं करता है. यह केवल नाममात्र स्थितियों में एक विशिष्ट बिंदु को लक्षित करेगा. इसलिए, अगर प्रदर्शन ख़राब हुआ, तो यह उस क्षेत्र में कहीं भी उतर सकता है.’

इसरो प्रमुख ने कहा कि चंद्रयान-3 में ईंधन भी अधिक है, जिससे इसमें यात्रा करने या पथ-विचलन को संभालने या वैकल्पिक लैंडिंग स्थल पर जाने की अधिक क्षमता है. उन्होंने कहा कि विक्रम लैंडर में अब अन्य सतहों पर अतिरिक्त सौर पैनल हैं, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि यह बिजली उत्पन्न करता रहे, चाहे यह चंद्र सतह पर कैसे भी उतरे.

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पहले प्रकाशित : 12 जुलाई, 2023, शाम 5:15 बजे IST

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