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REVIEW: खनखनाते, खरे सिक्कों से भरपूर हैं ‘गुल्लक’ सीजन 3 के सारे एपिसोड

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‘गुल्लक’ सीजन 3 की समीक्षा: ‘गुल्लक’ का सीजन 3, ओटीटी प्लेटफार्मों पर हिंसा, हंगामे और अश्लीलता के बीच दिमाग में रह जाने वाली बचत की छोटी सी पूंजी जैसा है. वो पूंजी जिससे अपनी सिमटी सी दुनिया में जीवन संघर्ष के साथ छोटी छोटी बातों पर खुश रहने सपने देखने की समाजिक ताकत बची रहती है. गुल्लक के पहले सीजन में गैरमहानगरीय शहरों के मध्यवर्ग की उम्मीदों और हकीकत की कचकच के बीच जीने, जूझने और उसका भी मजा लेने को बाखूबी उठाया गया. दूसरे सीजन में कुछ भटकाव के साथ हास्य पैदा करने की कोशिश में सीरीज बनाने वालों की ताकत जाया होती नजर आई, लेकिन तीसरे सीजन में हर संदेश साफतौर से उभर कर सामने आया. छोटे से मकान में भरपूर गमकती जिंदगी और परिवार में पूरी ताकत से जुड़ी-गुंथी भारतीय मध्यवर्गीय स्थिति को बाखूबी उकेरा गया.

यादें कुरेदने में सफल
इस सीरीज का मजा उनके लिए बढ़ जाता है, जिन्होंने दिल्ली-मुंबई छोड़ किसी छोटे शहर में नौकरीपेशा परिवार के बीच जिंदगी का लुत्फ लिया है. जहां घर भले छोटे हों, लेकिन दरवाजे किसी के लिए बंद नहीं होते. ऐसे शहरों में आपके घर में गैस सिलिंडर है कि नहीं इस बारे में आप पड़ोसी से झूठ नहीं बोल सकते. पड़ोसी बोलने ही नहीं देगा. इन शहरों में लोग आपके मानसिक दुख में मजा लेने में पीछे नहीं रहते, लेकिन एक सीमा के बाद, मदद में उतर आते हैं. कोई पुराना परिचित आ जाता है तो उसके लिए अपना कमरा छोड़ना पड़ता है. बहुत सारे लोगों के पास कोई और दूसरा कमरा होता ही नहीं. लिहाजा मेहमान को अपनी पूरी सहूलियत सौंप, रात छत पर मच्छरों से जूझते गुजारने में गुरेज नहीं होती.

किफायती शूटिंग, लेकिन कलाकारी असरदार
ये सीरीज मार-पीट, जासूसी और अश्लीलता परोसने वाली दूसरी सीरीज के बराबर कमाई करे या न करे, इसे बनाने में प्रोड्यूसर ने मध्य वर्ग जैसी ही किफायत बरती है. ऐसा लगता है कि तीन चार मौकों पर अलग सेट को छोड़ दिया जाए, तो सारी कहानी एक मकान के एक कमरे, एक कोठरी, आंगन और छत पर ही घूमती रहती है. लिहाज यहां-वहां शूट करने का खर्च ज्यादा नहीं आया होगा. सारे के सारे किरदार पहले की दो सीरीज वाले ही हैं. उनका अभिनय, शास्त्रीयता की कसौटी या दूसरी जगहों पर पता न कितना खरा उतरे लेकिन सीरीज के कैरेक्टर में घुसनें में पूरी तरह सफल रहे हैं. कलाकारों में जमील खान, हर्ष मायर, वैभव राज गुप्ता, गीतांजलि कुलकर्णी और सुनीता ने कुछ ऐसा अभिनय किया है कि आपको लगेगा, आपने ऐसे किसी चरित्र को कभी न कभी अपने गिर्दोपेश देखा ही होगा.

भविष्यवाणी-आकाशवाणी की अहमियत
सीरीज में कभी-कभी पर्दे के पीछे से की जाने वाली कमेंट्री गैर जरूरी लगी, लेकिन उसने सीरीज का जायका खराब नहीं किया है. वैसे भी मध्यवर्ग, बिना आकाशवाणी और भविष्यवाणी के, रह कैसे सकता है.

थोड़े में संतोष की कहानी
इस सीजन में मिश्रा जी का बड़ा बेटा नौकरी कर रहा है. एमआर यानी मेडिकल रिप्रजेंटेटिव की नौकरी. वही बेटा जो एसएससी के जरिए कुछ बड़ा करना चाहता था. सपना सच न हो सका. कोई बात नहीं. पूरी तरह सच न होने पर सपने के करीब पहुंचने की खुशी भी, मध्य वर्ग के लिए कम नहीं होती. मिश्रा जी खुश हैं कि घर में एक और सेलरी अकाउंट खुल गया है. बेटे की हसरत है, पहली सेलरी से सस्पेंसन वाले जूते खरीद कर ऐय्याशी की. सही भी है. हैंड टू माउथ रहने वाले इस वर्ग के लिए आज भी सात हजार के जूते खरीदना ऐय्याशी से कम क्या है.

ऐय्याशी की ये हसरत, बहुत सारे सपनों की तरह, पूरी नहीं हो पाती. हालात के स्पीड-ब्रेकर सस्पेंशन वाले जूते को आंगन तक नहीं आने देते. छोटे वाले की फीस के लिए जूते कुर्बान करने पड़ते हैं. हां, बेटे की तनख्वाह से, छोटे वाले की फीस के लिए पैसे मांगने में हिचक बाप और मां दोनो को है. इस खीच-तान को बहुत बेहतरीन ढंग से दिखाया गया है. छोटे का एडमिशन हो जाता है. लेकिन प्रैक्टिकल के दौरान ‘ट्राइट्रेसन’ का सही रंग लाने के लिए गन्ने का जूस टेस्ट ट्यूब में लेकर एक्जामिनर को देने पर उसे स्कूल से निकाल दिया जाता है.

सत्यनारायण भगवान की जयकर हुई, लेकिन चिट्ठी आ ही गई
कहानी मध्य वर्ग की है. परिवार मिश्रा जी का है. फिर सत्यनारायण की कथा न होती तो अधूरापन रहता. कथा हो जाती है. खत्म होते-होते प्रसाद भी, एक-दो को छोड़, सभी को दे दिया जाता है. बाधा-बिघ्न हटाने का पंडित जी आशिर्वाद भी दे देते हैं. बेटे भी साइंस-मैथ्स की पढ़ाई से मुक्ति का जुगाड़ पंडित जी के जरिए फिट कर लेते हैं. अब इंतजार है, छोटे वाले बेटे के स्कूल से सस्पेंशन की चिट्ठी का. लेकिन कहानी में विचित्र मोड़ आ जाता है और एक दूसरी चिट्ठी आ जाती है. यूनियन की राजनीति में न घुसने की जिद में मिश्रा जी को सस्पेंड होना पड़ता है. ये सदमा दिल का दौरा ले आता है. फिर भी इस संकट ने पूरे परिवार को जिस तरीके से जोड़ा है, वही अपने देश के शहरी मध्यवर्ग के परिवार की जीवन-शक्ति है. दिल के दौरे से बेहोश पिता को लेकर, बड़ा बेटा नंगे पैर, अस्पताल भागता है तो छोटा चप्पल लेकर अस्पताल जाता है. अस्पताल में ही वो बड़े भाई को चप्पल पहनाता है. दरअसल मध्यवर्ग की ताजपोशी ऐसे ही होती है- सर पे पग पहना कर नहीं, बल्कि जिम्मेदारी उठाने वाले पैरों को, राह में आने वाले कांटों से, बचाने वाली चप्पलें पहना कर.

शादी तोड़ने वाला अगुवा
चूल्हे चौके में जिंदगी खपाने वाली गृहणियों की चेतना में आए बदलाव को भी पूरी जिम्मेदारी से उठाने में सीरीज बनाने वालों की कोशिश सफल रही. मिश्रा जी की पत्नी, शादी में अगुवा बने मिश्रा जी से, शादी तोड़ने को कहतीं हैं. दरअसल, अपने अरमान चूल्हे में जलाकर, घर सजाने वाली इस महिला ने गांव से आई उस लड़की की परेशानियों को अनुभव के खुर्दबीन से पहले ही देख लिया था. सामान्य तौर पर शादी जोड़ने वाले अगुवा को यहां सीधे शादी तोड़ते दिखाया गया है, जो रोचक है.
इस सीरीज की कहानी में यथार्थ को बिना तंगी और भूख का रोना रोए पिरो देने के लिए निर्देशक पलाश वासवानी बधाई के पात्र हैं. लाइटिंग और साउंड उम्दा है. संगीत भी पूरी तरह साथ देता है. कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि गुल्लक सीजन थ्री को देखना चाहिए.

डिटेल्ड रेटिंग

कहानी :
स्क्रिनप्ल :
डायरेक्शन :
संगीत :

टैग: समीक्षा, वेब सीरीज

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