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‘Love Hostel’ Film Review: ‘लव हॉस्टल’ में सिर्फ हेट ही जगह पाती है

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‘लव हॉस्टल’ फिल्म समीक्षा: कहते हैं कि फिल्म लेखक से निर्देशक आसानी से बना जा सकता है या यूं कहें की सीधा रास्ता है. कुछ कहते हैं कि फिल्म एडिटर भी अच्छे निर्देशक बनते हैं. एक विचार ये भी है कि वर्षों के अनुभव के बाद तो सिनेमेटोग्राफर को निर्देशक बन ही जाना चाहिए, क्योंकि तकरीबन आधी फिल्म तो सिनेमेटोग्राफर के दिमाग में ही बन जाती है. पीपली लाइव, रॉकी हैंडसम, मुक्केबाज़ और लाल कप्तान जैसी विविध और विभिन्न विषयों पर बनी फिल्मों के सिनेमेटोग्राफर शंकर रमन ने 2006 में निर्देशक बनने का फैसला किया था.

उनकी पहली फिल्म थी गुडगांव जो कि गुड़गांव के एक लैंड माफिया के पारिवारिक कलह और उसे से जन्मे अपराध और कत्लों की कहानी थी. इस फिल्म को बहुत प्रशंसा मिली. इसके अलावा शंकर ने सिनेमेटोग्राफी और कुछ साल बाद स्क्रीनप्ले के लिए भी नेशनल अवॉर्ड जीता है. शंकर ने नेटफ्लिक्स की सीरीज ‘लीला’ के भी कुछ एपिसोड डायरेक्ट किये थे. उनकी दूसरी फीचर फिल्म ‘लव हॉस्टल’ हाल ही में ज़ी5 पर रिलीज़ हुई है. फिल्म “ऑनर किलिंग” पर आधारित है, हालांकि कहानी नई नहीं होने की वजह से फिल्म में रूचि बड़ी मुश्किल से जागती है.

आशु शौक़ीन उर्फ़ शौक़ीन अहमद (विक्रांत मैसी) और ज्योति दिलावर (सान्या मल्होत्रा) घर से भागकर शादी करने का इरादा रखते हैं. ज्योति की मां, दादी, भाई और गांव वाले ज्योति के घर से भागने की बात पर अपने अंदर का जाट जगा लेते हैं. इधर आशु और ज्योति कोर्ट पहुंचते हैं, अपनी टीचर निधि दहिया (अदिति वासुदेव) और वकील खन्ना की मदद से कोर्ट में शादी रजिस्टर करने की प्रक्रिया आरम्भ करते हैं और कोर्ट से अपने संरक्षण की मांग भी करते हैं तो विशेष परमिशन के तहत आशु और ज्योति को पुलिस के एक सेफ होम में भेजा जाता है जहां उनके जैसे और भी अंतर्जातीय विवाह के लिए आवेदन करने वाले जोड़ों को पुलिस प्रोटेक्शन में रखा जाता है.

ज्योति की दादी के कहने पर एक हिटमैन या यूं कहें खाप पंचायत का कॉन्ट्रैक्ट किलर, विराज सिंह डागर (बॉबी देओल) को उन्हें ढूंढने और मारने के लिए भेजा जाता है. विराज उन्हें ढूंढने में कामयाब हो जाता है, लेकिन आशु और ज्योति उसे काफी देर तक चकमा देते रहते हैं और जा कर अपनी टीचर निधि दहिया के घर जा कर छुप जाते हैं. आशु की हत्या ज्योति के घरवाले कर देते हैं और ज्योति को विराज गोली मार देता है. आगे जा कर विराज को सड़क के किनारे एक लोडिंग टेम्पोवाला टक्कर मार देता है और वो भी मर जाता है.

लव हॉस्टल की कहानी का मूल आयडिया कुणाल शर्मा का है. महक जमाल और योगी सिंघा ने निर्देशक शंकर रमन के साथ मिल कर पटकथा लिखी है. योगी सिंघा ने इस फिल्म की डायलॉग लिखे हैं इसलिए फिल्म में ऑथेंटिक हरयाणवी बोली गयी है. कहानी से लोग प्रभावित हो सकते हैं लेकिन इस फिल्म में कुछ भी नयापन नहीं है सिवाय “लव हॉस्टल” के दृश्यों के. खाप पंचायत, ऑनर किलिंग, हरयाणवी पृष्ठभूमि, बददिमागी, छुटपन से पितृसत्तात्मक समाज, घर में लड़कियों का नीचा दर्जा, घर घर में बन्दूक आदि बातें बहुत ही सामान्य है और कई फिल्मों में देखी जा चुकी हैं.

ऑनर किलिंग पर ही अनुष्का शर्मा की एनएच 10 एक बहुत ही खूंखार और सच्ची फिल्म बन चुकी है. लव हॉस्टल में गुड़गांव वाला दुस्साहस नहीं है. गुड़गांव फिल्म का हर एक सीन दिमाग पर हथौड़े की तरह बजता है लेकिन लव हॉस्टल में ये बात नहीं आ पायी है. योगी सिंघा और शंकर ने गुड़गांव लिखी थी इसलिए उनसे बेहतर की उम्मीद थी. कहानी की अच्छी बात यह है कि कहानी सतत प्रवाह में है. कोई झटका नहीं है. हर दृश्य सोच समझ कर लिखा गया है. तारतम्य जुड़ा हुआ है दृश्यों के बीच का और एक भी किरदार फ़ालतू नहीं है, सिर्फ हंसाने के लिए कॉमेडी भी नहीं की गयी है. सेफ होम के इंचार्ज इंस्पेक्टर चौधरी (सिद्धार्थ भारद्वाज) का किरदार देख कर लगता है कि कॉमिक विलन होगा लेकिन उसकी जुबान की कड़वाहट भी कमाल करती है.

विक्रांत मैसी और सान्या मल्होत्रा के सीन अच्छे हैं. केमिस्ट्री नज़र आती है लेकिन सीन्स की संख्या कम लगती है. बॉबी देओल खूंखार लगे हैं. बॉबी के लिए स्क्रिप्ट में परिवर्तन किये गए थे तब जा कर उन्होंने ये नेगेटिव रोल स्वीकार किया. अपने दिमाग में ऑनर किलिंग को लेकर वो इतने कन्विंस्ड नज़र आते हैं कि अपनी बेटी की फ़रियाद भी उन्हें सुनाई नहीं देती और वो बेतकल्लुफ अंदाज़ में उसके सामने ही उसकी स्टूडेंट सान्या मल्होत्रा को गोली मार देते हैं. बॉबी के कैरेक्टर में काफी स्कोप था बेहतरीन अभिनय का और बॉबी ने उसे भुना लिया. एक लंगड़ाते हुए कुत्ते के साथ उनके कुछ दृश्य हैं जो लाजवाब हैं.

आखिरी दृश्य में कुत्ते का बॉबी की लाश को सूंघते हुए दिखाना और फिर वहां से आज़ादी की और चले जाना कमाल है. डीसीपी सुशील राठी (राज अर्जुन) का किरदार बहुत बढ़िया गढ़ा गया है. पुलिस की मजबूरी, गांववालों की ऑनर किलिंग में पुलिस का कुछ भी न कर पाना और जेल में आतंकवादी होने का इलज़ाम झेलते विक्रांत मैसी के अब्बा को छुड़ाने के बदले विक्रांत से मुखबिरी करवाना और फिर भी उसकी मदद न कर पाना, ये सब उन्होंने बड़ी सहजता से निभाया है. बाकी किरदार भी प्रभावी हैं. अक्षय ओबेरॉय, सिमरन रावल, और योगेश तिवारी के किरदार छोटे हैं लेकिन बहुत ही महत्वपूर्ण हैं.

संगीत का स्कोप था लेकिन क्लिंटन सेरेजो और बिआन्का गोमेज़ के गाने “बस में नहीं और जीत गांगुली के गाने “चली आ” में अच्छे कम्पोजीशन होने के बावजूद, पॉपुलर होने के तत्व नहीं हैं. फिल्म गुड़गांव और अमेज़ॉन की चर्चित वेब सीरीज “इनसाइड एज” के सिनेमेटोग्राफर विवेक शाह ने खूबसूरत कलर पैलेट का इस्तेमाल किया है. शंकर खुद अवॉर्ड विनिंग सिनेमेटोग्राफर हैं तो उनकी फिल्म में कैमरे के जादू की उम्मीद करना ज़रूरी है. विवेक ने वो जादू पैदा किया है. हल्का सा काऊबॉय फिल्म्स जैसा धूल का रंग लेकर विवेक ने बहुत बढ़िया शॉट्स और कैमरा एंगल का इस्तेमाल किया है. गली बॉय और हाल ही में रिलीज़ ’83 फिल्म के एडिटर नितिन बैद ने फिल्म की फाइनल एडिट की है जबकि फर्स्ट एडिट शान मोहम्मद (वेक अप सिड, कालाकाण्डी और गुड़गांव) ने की है. नितिन की वजह से फिल्म एकदम कसी हुई नज़र आती है.

लव हॉस्टल की कहानी पुरानी है, और फिल्म भी काफी सारी देखी देखी सी ही लगती है लेकिन फिल्म छोटी है इसलिए एक बैठक में देख कर “ऑनर किलिंग” के दुष्परिणामों को देख सकते हैं, उस पर चर्चा कर सकते हैं. सभी का अभिनय अच्छा है इसलिए आप बोर नहीं होंगे.

डिटेल्ड रेटिंग

कहानी :
स्क्रिनप्ल :
डायरेक्शन :
संगीत :

टैग: बॉबी देओल, छवि समीक्षा

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